दलितों-आदिवासियों की बड़ी पक्षधर रमणिका जी का अवसान, हिन्दीग्राम ने दी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

दलितों-आदिवासियों की बड़ी पक्षधर रमणिका जी का अवसान, हिन्दीग्राम ने दी अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

इंदौर। मार्च खत्म होते-होते मौत ने जैसे अपने बही खाते का आखिरी हिसाब वसूल लिया- हिंदी की जानी-मानी लेखक, संपादक और संचयनकर्ता रमणिका गुप्ता को अपने साथ ले गई, पीछे छूट गए हमारी तरह के पेशेवर श्रद्धांजलि लेखक- यह बताने के लिए कि इस साल अर्चना वर्मा, कृष्णा सोबती और नामवर सिंह के बाद हिंदी के साहित्याकाश को हुई चौथी क्षति है और यह जोड़ने के लिए कि 89 को छूती उम्र में रमणिका गुप्ता का निधन शोक का नहीं, एक जीवन की संपूर्णता को महसूस करने का विषय है।
आदिवासी अधिकारों के लिए काम करने वाली साहित्यकार और नारीवादी रमणिका गुप्ता का नई दिल्ली में निधन हो गया। वे 89 साल की थीं। रमणिका अंत समय तक समाज कार्य और साहित्य में सक्रिय थीं। वे सामाजिक सरोकारों की पत्रिका ‘युद्धरत आम आदमी’ का सम्पादन करती थीं। रमणिका गुप्ता के निधन से समाजकर्मी और साहित्यकारों में शोक की लहर है ।
22 अप्रैल 1930 को पंजाब में जन्मीं रमणिका के पति सिविल सर्विस में थे। उनके पति का पहले ही निधन हो चुका था, उनकी दो बेटियां और एक बेटा है। रमणिका के करीबी सूत्रों ने बताया कि उनके सभी बच्चे इस वक्त विदेश में हैं।
सामाजिक आंदोलनों के लिए विशेष पहचान बनाने वाली रमणिका विधायक भी रहीं। उन्होंने बिहार विधानपरिषद और विधानसभा में विधायक के रूप में कार्य किया।रमणिका ने ट्रेड युनियन लीडर के तौर पर भी काम किया। वे कई आंदोलनों का चेहरा मानी जाती हैं। उन्होंने कई किताबें भी लिखीं। उनकी आत्मकथा हादसे और आपहुदरी काफी मशहूर है।
मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने कहा कि ‘रमणिका गुप्ता जी का आकस्मिक निधन साहित्याकाश की बड़ी और अपूरणीय क्षति है।’
उनके निधन पर मातृभाषा उन्नयन संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’, एवं सभी सदस्यों ने गहरा दु:ख व्यक्त करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की।

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