भावना शर्मा: कहानीकार से प्रकाशक तक की यात्रा

संघर्ष से तय होता है सफलता का आयाम

धर्म ग्रंथों में लिखा है कि एक रात से सुबह तक की यात्रा सफलता के मापदंड तय नहीं करती, बल्कि नियमितता और निरंतरता के साथ कोई कार्य किया जाए तो वह एक दिन सफल परिणाम में बदलता है। एक ऐसी ही कहानी देश की राजधानी दिल्ली की होनहार लेखिका भावना शर्मा की है।
भावना शर्मा का जन्म 25 नवम्बर को पिता रविदत्त शर्मा और माता उर्मिला शर्मा के घर हुआ। फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक और स्नातकोत्तर (हिन्दी) की पढ़ाई कर बी. एड. का अध्ययन किया। इसी के साथ, अनुवाद में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा, भारतीय अनुवाद परिषद् व मल्टी मीडिया और वेब डिज़ाइनिंग इत्यादि व्यावसायिक डिप्लोमा अर्जित किए। भावना शर्मा मूलतः कहानीकार हैं, आपका कहानी संग्रह ‘अतुल्य रिश्ते’ प्रकाशित हुआ, इसके बाद ‘बुनकारी’ और अनुवादित पुस्तक ‘गगनसिद्धि’ प्रकाशित हुई। साथ ही, पुस्तक संपादन और पुस्तक ध्वन्यांकन भी किया।

लेखकीय दायित्व के अतिरिक्त यह कहानी मिलती है दिल्ली के कनॉट पैलेस पर घूमते-घूमते, बाराखम्बा पर ब्रेड पकौड़े खाते हुए, जिसने शुरू किया अपना एक अलग व्यवसाय, जिसका मूल ध्येय यही था कि ‘पाठकों तक अच्छी किताबें पहुँचाना और लेखकों को अच्छे पाठकों से मिलवाना।’
भावना ने अपने करियर की शुरुआत कोई बहुत अधिक निवेश या कोई बड़े स्टार्टअप से नहीं की थी बल्कि स्वयं की अलग पहचान बनाने के विचार से की थी। वैसे भी समाज स्त्रियों की अपनी अलग पहचान को सहज पचा नहीं पाता था परन्तु 21वीं सदी की स्त्रियाँ किसी से कम भी नहीं हैं।
भावना बताती हैं कि “मेरे पास कोई बड़ी-बड़ी धनराशि नहीं थी, मैंने एक-एक रुपया जोड़कर अपने सपनों को पूरा किया है और आज भी मैं सपने देखती हूँ और उसे पूरा करने के लिए अपनी मेहनत पर अधिक विश्वास करती हूँ।”

अच्छे लेखक और पाठकों के बीच का सेतु है प्रकाशन

बतौर कहानीकार भावना ने लेखकीय जीवन यात्रा को प्रारंभ किया। किन्तु बतौर पाठक गुणवत्तायुक्त सामग्री की खोज हमेशा सहज रूप से पूरी नहीं हो पाई, इसी कारण चुना प्रकाशन का क्षेत्र, जहाँ लेखक और पाठक दोनों की सुविधाओं और पसंद की पूर्ति की जा सकती थी।
भावना शर्मा ने ‘यात्रा बुक्स’ की नौकरी से प्रकाशन के क्षेत्र में प्रवेश किया, फिर केबीएस तैयार किया। किन्तु अपरिहार्य कारणों से केबीएस बन्द कर वर्तमान में, संस्मय प्रकाशन की निदेशक के रूप में आप कार्यरत हैं।

हिन्दी सेवा के ध्येय ने भावना को बना दिया ‘हिन्दीयोद्धा’

हिन्दी भाषा की सेवा का भाव मन में सदा से रहा और इसी कारण मातृभाषा उन्नयन संस्थान से जुड़ना भी सम्भव हुआ। संस्थान के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’ ने भावना को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बतौर सदस्य कार्यभार दिया। आपने दिल्ली में हिन्दी में हस्ताक्षर बदलो अभियान कार्यक्रम संचालित कर लाखों लोगों के हस्ताक्षर बदलवाए। इसके बाद काव्य उत्सव, पुस्तक विमोचन इत्यादि कई कार्यक्रम आयोजित कर हिन्दी के विस्तार का कार्य किया। आप वर्तमान में मातृभाषा उन्नयन संस्थान की राष्ट्रीय सचिव हैं। साथ ही, मासिक साहित्य ग्राम व मातृभाषा डॉट कॉम की सह सम्पादक हैं। सतत् हिन्दी सेवा के कार्यों के कारण आपको लोग हिन्दीयोद्धा के रूप में भी पहचानते हैं।

रंगमंच भी है भावना को प्रिय

नाट्य विधा में दक्ष भावना शर्मा को रंगमंच काफ़ी प्रिय है, उन्होंने कई नाटकों में अभिनय भी किया है। बीसियों नाटकों का मंचन हुआ, जिसमें भावना ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है।

कई सम्मान व उपलब्धियाँ भावना के खाते में दर्ज

अब तक कई सम्मान भावना शर्मा को प्राप्त हुए, इनमें साहित्य गौरव सम्मान, वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई सम्मान, महिला गौरव सम्मान, महादेवी वर्मा सम्मान, अखण्ड गहमरी सम्मान, भारत गौरव रत्न सम्मान इत्यादि सम्मिलित हैं।

‘कम बोलना-काम अधिक करना’ यही सफलता का मूल मंत्र

भावना स्वभावगत कम बोलती हैं और यही बताती भी हैं कि, “काम के बारे में प्रपोगंडा न हो, बल्कि धरातल पर अपना किया हुआ कार्य दिखाई देना चाहिए।” इसीलिए भावना मानती हैं कि अपनी मेहनत को सर्वोपरि मानकर निरंतर काम करने से सफलता मिलती है।