प्रेम मंगल : साधना, संघर्ष और सृजन की प्रेरक यात्रा

भारत केवल सभ्यता और संस्कृति का देश नहीं, बल्कि वह भूमि है जहाँ शब्द साधना बनते हैं और लेखनी सामाजिक चेतना का स्वर। इसी भारत के हृदयस्थ मध्यप्रदेश को शास्त्रों में रत्नगर्भा धरती कहा गया है-और यह नाम यूँ ही नहीं पड़ा। इस धरती ने असंख्य ऐसे रचनाकार दिए हैं, जिन्होंने अपने सतत् परिश्रम, संकल्प और सृजनशीलता से भारतीय साहित्य को नई ऊँचाइयाँ दी हैं। इन्हीं प्रेरणास्रोत व्यक्तित्वों में एक सशक्त नाम है- प्रेम मंगल।

मध्यप्रदेश की साहित्यिक राजधानी इन्दौर में निवासरत श्रीमती प्रेम मंगल की जीवन-यात्रा यह प्रमाणित करती है कि परिस्थितियाँ कितनी ही साधारण क्यों न हों, यदि संकल्प दृढ़ हो तो साधना असाधारण बन जाती है। आपका जन्म 15 नवम्बर 1949 को गुना (म.प्र.) में हुआ। शिक्षा के प्रति गहरी निष्ठा रखते हुए आपने सन् 1970 में अर्थशास्त्र में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और कॉन्वेंट स्कूल, गुना में अध्यापन कार्य से अपने सेवा पथ की शुरुआत की।
इसके बाद इन्दौर से बी.एड. कर आपने शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गुना में व्याख्याता (एडहॉक) के रूप में युवाओं को दिशा दी। किंतु जीवन की यात्रा केवल एक राह पर नहीं चलती- सन् 1975 में भारतीय डाक विभाग में प्रवेश कर आपने अनुशासन, ईमानदारी और कर्त्तव्यनिष्ठा के साथ विभिन्न पदों एवं स्थानों पर सेवाएँ दीं और सन् 2009 में इन्दौर से सेवानिवृत्त हुईं।
सेवानिवृत्ति को विराम नहीं, बल्कि नव आरंभ मानते हुए आपने पुनः सक्रिय जीवन चुना। स्वामी विवेकानंद इंजीनियरिंग कॉलेज में ऑफ़िस सुपरिटेंडेंट, शेमरॉक स्कूल में इंस्टिट्यूशन हेड तथा शार्प माइंड स्कूल में प्रधानाचार्या के रूप में कार्य करते हुए आपने यह सिद्ध किया कि सीखने और सिखाने की कोई आयु नहीं होती।


साहित्य के प्रति आपका अनुराग बचपन से ही जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा। नौकरी, पारिवारिक दायित्वों और सामाजिक ज़िम्मेदारियों के बीच भी आपकी लेखनी रुकी नहीं। सामाजिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक, देशभक्ति और मानवीय संवेदनाओं से जुड़े विषयों पर आपने निरंतर लेखन किया। अब तक आपके दो काव्य संग्रह- ‘लम्हें ज़िंदगी के’ और ‘मंगलमय पथगामिनी’, कहानी संग्रह ‘पैमाना’, कविता संग्रह ‘गर भूख न होती’ एवं ‘दीया मेरी भावना का’, बाल कविता संग्रह तथा काव्य संग्रह ‘प्रेम रतन’ सहित दो साझा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
आपकी रचनाएँ केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि अनुभव, संवेदना और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति हैं। इसी सृजनशील अवदान के लिए आपको वर्ष 2021 और 2022 का संस्मय सम्मान, तथा वर्ष 2025 में ख़बर हलचल न्यूज़ द्वारा नेशनल ब्रिलियन्स अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। आप मातृभाषा उन्नयन संस्थान की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य भी हैं और विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से जुड़कर निरंतर साहित्य सेवा कर रही हैं।
कवि गोष्ठियों, काव्य उत्सवों, लघुकथा मंथन और साहित्यिक मंचों पर आपके रचनापाठ ने असंख्य श्रोताओं और नवलेखकों को प्रेरित किया है। सैंकड़ों रचनाएँ और बीसियों सम्मान आपकी इस साधनापूर्ण यात्रा के साक्षी हैं।
प्रेम मंगल का जीवन इस सत्य को स्थापित करता है कि यदि आत्मा में साहित्य बसता हो, तो हर पड़ाव सृजन का अवसर बन जाता है। उनकी यात्रा नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए एक स्पष्ट संदेश है-संघर्ष से घबराइए मत, निरंतर लिखिए, निरंतर सीखिए, क्योंकि लेखनी ही वह दीपक है, जो अंधकार में भी मार्ग दिखाता है।