
‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ पर अर्चित जैन पाडकास्ट में सार्थक संवाद
भोपाल। भारतीय ज्ञान परंपरा पर आधारित अर्चित जैन के हालिया पाडकास्ट ने राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा को जन्म दिया है। इस विशेष संवाद में वरिष्ठ शिक्षाविद एवं मीडिया विशेषज्ञ प्रो. संजय द्विवेदी ने भारत की प्राचीन बौद्धिक परंपरा, उसकी आधुनिक प्रासंगिकता और नए भारत की वैचारिक दिशा पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। श्रोताओं और अकादमिक जगत ने इस संवाद की गहराई और स्पष्टता की विशेष सराहना की है।
संवाद में प्रो. द्विवेदी ने कहा कि भारत की असली बौद्धिक शक्ति उसकी हजारों वर्षों पुरानी सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपरा में स्थित है, जो मनुष्य, समाज और प्रकृति के समन्वय पर आधारित एक समग्र जीवन-दर्शन प्रस्तुत करती है। उनके अनुसार, आधुनिकता और पश्चिमी प्रतिमानों के प्रभाव से भारत ने अपनी मूल चेतना से कुछ दूरी अवश्य बनाई है, किंतु यह समय अपनी ज्ञान-परंपरा को नए आत्मविश्वास के साथ पुनर्स्थापित करने का है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘नए भारत’ की परिकल्पना केवल आर्थिक विकास या तकनीकी प्रगति तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसे सांस्कृतिक, नैतिक और वैचारिक पुनर्जागरण पर आधारित होना चाहिए। उनके अनुसार, सभ्यता से कटकर विकास न तो टिकाऊ हो सकता है और न ही समाजोन्मुख। भारत के लिए आवश्यक है कि वह उपनिषद, वेद, लोक-परंपरा और जीवन व्यवहार की अपनी विरासत को आधुनिक संदर्भ में समझते हुए आगे बढ़े।
प्रो. द्विवेदी ने भारतीय ज्ञान परंपरा को वैज्ञानिक, अन्वेषी और लोक-मंगल केंद्रित बताया। उन्होंने कहा कि भारत में ज्ञान का उद्देश्य केवल जानकारी पाना नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, सुंदर और समाजोपयोगी बनाना है।
यह पाडकास्ट शिक्षकों, शोधकर्ताओं, मीडिया विद्यार्थियों और नीति-निर्माताओं में चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बन गया है। सोशल मीडिया पर इसे भारतीय ज्ञान परंपरा की आधुनिक व्याख्या के रूप में व्यापक रूप से साझा किया जा रहा है। प्रो. द्विवेदी का यह संवाद विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध है और बड़ी संख्या में लोग इसे देख रहे हैं। इसे यूट्यूब पर इस लिंक पर देख सकते हैं, –