हिंदी गौरव अलंकरण: हिंदी भाषा सेवा का राष्ट्रीय सम्मान

हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता और सामाजिक एकता की जीवंत अभिव्यक्ति है। बदलते वैश्विक परिदृश्य में जब भाषाई आत्मविश्वास की परीक्षा हो रही है, तब हिंदी के संरक्षण, संवर्धन और विस्तार के लिए समर्पित व्यक्तित्वों का सम्मान करना समय की आवश्यकता बन जाता है। इसी उद्देश्य से मातृभाषा उन्नयन संस्थान द्वारा प्रदान किया जाने वाला “हिंदी गौरव अलंकरण” आज हिंदी आंदोलन का एक प्रतिष्ठित और प्रेरक प्रतीक बन चुका है।

हिंदी गौरव अलंकरण: स्वरूप और परिकल्पना

वर्ष 2020 में स्थापित हिंदी गौरव अलंकरण हिंदी भाषा, साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता, प्रशासन, सामाजिक चेतना और जनजागरण के क्षेत्र में सतत् एवं प्रभावशाली योगदान देने वाली विभूतियों को प्रदान किया जाने वाला सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान है। इसका उद्देश्य केवल सम्मान देना नहीं, बल्कि हिंदी के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व और भाषाई स्वाभिमान को सुदृढ़ करना है।

उद्देश्य और दृष्टि

हिंदी गौरव अलंकरण की मूल दृष्टि निम्न बिंदुओं पर केंद्रित है:
● हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार को संस्थागत मान्यता देना।
● हिंदी सेवियों के कार्यों को राष्ट्रीय मंच प्रदान करना।
● युवा पीढ़ी में मातृभाषा के प्रति गर्व और प्रतिबद्धता उत्पन्न करना।
● हिंदी आंदोलन को वैचारिक और सामाजिक मज़बूती देना।

चयन प्रक्रिया और श्रेणियाँ

यह अलंकरण प्रतिवर्ष दो विभूतियों को प्रदान किया जाता है। चयन प्रक्रिया पारदर्शी, निष्पक्ष और योग्यता-आधारित होती है, जिसमें दीर्घकालीन योगदान, सामाजिक प्रभाव, कार्यक्षेत्र की व्यापकता और हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता को प्रमुख मानदंड माना जाता है। सम्मान सामान्यतः दो भिन्न श्रेणियों में दिया जाता है, जिसमें एक हिंदी साहित्य और दूसरी विधा हिंदी पत्रकारिता है, जिससे विविध क्षेत्रों में कार्यरत हिंदी सेवियों को समुचित सम्मान मिल सके।

किन क्षेत्रों के हिंदी सेवियों को मिलता है सम्मान?

हिंदी गौरव अलंकरण निम्नलिखित क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वालों को प्रदान किया जाता है:
● हिंदी साहित्य, सृजन और आलोचना
● शिक्षा, शोध और अकादमिक जगत
● पत्रकारिता, मीडिया और जनसंचार
● सामाजिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक संगठन
● प्रशासनिक सेवाएँ और सार्वजनिक जीवन
● डिजिटल माध्यमों पर हिंदी का नवाचारपूर्ण विस्तार

मातृभाषा उन्नयन संस्थान: संकल्प और भूमिका

मातृभाषा उन्नयन संस्थान हिंदी भाषा के संरक्षण और उन्नयन के लिए समर्पित एक प्रतिष्ठित राष्ट्रीय संस्थान है। संस्थान का लक्ष्य हिंदी को जन-जन की भाषा बनाना, शासन-प्रशासन में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देना और समाज में भाषाई स्वाभिमान को सुदृढ़ करना है। हिंदी गौरव अलंकरण इसी दीर्घकालिक संकल्प का सशक्त और दृश्यात्मक परिणाम है।

हिंदी आंदोलन में हिंदी गौरव अलंकरण का महत्त्व

आज के समय में जब भाषाई चुनौतियाँ और सांस्कृतिक दबाव बढ़ रहे हैं, हिंदी गौरव अलंकरण जैसे सम्मान हिंदी आंदोलन को नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करते हैं। यह अलंकरण न केवल सम्मानित व्यक्तित्व को गौरवान्वित करता है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि हिंदी सेवा राष्ट्र सेवा का अभिन्न अंग है।

हिन्दी गौरव अलंकरण से अब तक अलंकृत व्यक्तित्व (वर्षवार)

हिंदी भाषा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना की सेवा में निरंतर योगदान देने वाले विशिष्ट व्यक्तित्वों को मातृभाषा उन्नयन संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष हिंदी गौरव अलंकरण से सम्मानित किया जाता है। अब तक अलंकृत विभूतियों की प्रामाणिक सूची निम्नानुसार है:
वर्ष 2020
पद्मश्री अभय छजलानी (इन्दौर) एवं कवि राजकुमार कुम्भज (इन्दौर)

वर्ष 2021
श्री कैलाशचंद्र पंत (भोपाल) एवं डॉ. विकास दवे (इन्दौर)

वर्ष 2022
श्री कृष्ण कुमार अष्ठाना (इन्दौर) एवं डॉ. कृष्णा अग्निहोत्री (इन्दौर)

वर्ष 2023
डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित (उज्जैन) एवं प्रो. संजय द्विवेदी (नई दिल्ली)

वर्ष 2024
श्री मनोज श्रीवास्तव (भोपाल) एवं डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय (मुम्बई)

वर्ष 2025
डॉ. नीरजा माधव (सारनाथ) एवं श्री शिवकुमार विवेक (भोपाल)

यह सूची न केवल हिंदी सेवा की निरंतर परंपरा को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि हिंदी गौरव अलंकरण देश के विभिन्न भू-भागों में सक्रिय भाषा-सेवियों को राष्ट्रीय मंच प्रदान कर रहा है।

हिंदी गौरव अलंकरण: 6 वर्षों की यात्रा
वर्ष 2020 से प्रारंभ हुई हिंदी गौरव अलंकरण की यात्रा केवल एक सम्मान की कथा नहीं, बल्कि यह हिंदी भाषा के प्रति सामाजिक प्रतिबद्धता, वैचारिक दृढ़ता और सांस्कृतिक स्वाभिमान की निरंतर यात्रा है। बीते छह वर्षों में यह अलंकरण हिंदी आंदोलन के उन मूक नायकों को सामने लाने का माध्यम बना, जिनका कार्य भले ही प्रचार से दूर रहा हो, पर प्रभाव गहरा और स्थायी रहा है।

2020: संकल्प की नींव
कोरोना काल की अनिश्चितताओं के बीच हिंदी गौरव अलंकरण की स्थापना अपने-आप में एक साहसिक सांस्कृतिक निर्णय थी। पद्मश्री अभय छजलानी और कवि राजकुमार कुम्भज जैसे व्यक्तित्वों का चयन यह संकेत था कि यह अलंकरण केवल लोकप्रियता नहीं, बल्कि आजीवन हिंदी-सेवा को सम्मानित करेगा।

2021: वैचारिक विस्तार
दूसरे वर्ष में कैलाशचंद्र पंत और डॉ. विकास दवे को सम्मानित कर यह स्पष्ट किया गया कि हिंदी का क्षेत्र केवल साहित्य तक सीमित नहीं, बल्कि वैचारिक, शैक्षिक और सामाजिक सरोकारों से भी गहराई से जुड़ा है।

2022: निरंतरता और संतुलन
कृष्ण कुमार अष्ठाना और डॉ. कृष्णा अग्निहोत्री के चयन ने यह रेखांकित किया कि हिंदी सेवा एक सतत् साधना है, जिसमें संगठन, लेखन और वैचारिक स्पष्टता का संतुलन आवश्यक है।

2023: राष्ट्रीय फ़लक पर पहचान
डॉ. भगवतीलाल राजपुरोहित और प्रो. संजय द्विवेदी के सम्मान ने हिंदी गौरव अलंकरण को मध्यप्रदेश की सीमाओं से बाहर राष्ट्रीय विमर्श में स्थापित किया। यह वर्ष अलंकरण के राष्ट्रीय स्वरूप का निर्णायक पड़ाव सिद्ध हुआ।

2024: विचार से कर्म तक
मनोज श्रीवास्तव और डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय के चयन ने यह संदेश दिया कि हिंदी केवल विचार की भाषा नहीं, बल्कि प्रशासन, मीडिया और सार्वजनिक जीवन में कर्म की भाषा भी है।

2025: समकालीन विमर्श और स्त्री-स्वर
डॉ. नीरजा माधव और डॉ. शिवकुमार विवेक को सम्मानित कर अलंकरण ने समकालीन बौद्धिक विमर्श, स्त्री-स्वर और अकादमिक प्रतिबद्धता को विशेष महत्त्व दिया। यह वर्ष हिंदी गौरव अलंकरण की वैचारिक परिपक्वता का प्रतीक बना।

छह वर्षों की उपलब्धि
छह वर्षों की इस यात्रा में हिंदी गौरव अलंकरण ने यह सिद्ध किया है कि- हिंदी सेवा बहुआयामी है, इस सम्मान का आधार लोकप्रियता नहीं, प्रतिबद्धता है।
हिंदी गौरव अलंकरण हिंदी भाषा की निस्वार्थ सेवा करने वालों के लिए सम्मान, प्रेरणा और उत्तरदायित्व-तीनों का प्रतीक है। यह अलंकरण सिद्ध करता है कि हिंदी केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान की शक्ति और भविष्य की संभावना है। मातृभाषा उन्नयन संस्थान का यह प्रयास हिंदी के उज्ज्वल और सशक्त भविष्य की दिशा में एक निर्णायक क़दम है।